वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच भारत ने एक अहम कदम उठाते हुए ईरान से कच्चे तेल का आयात फिर से शुरू कर दिया है। करीब सात साल बाद हुई इस वापसी को भारत की ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। खास बात यह है कि इस बार तेल खरीद में भुगतान से जुड़ी कोई बड़ी बाधा सामने नहीं आई, जो पहले एक बड़ी समस्या रही थी।
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने हाल ही में ईरान से कच्चे तेल की नई खेप हासिल की है। हालांकि यह शुरुआत सीमित स्तर पर हुई है, लेकिन संकेत हैं कि आने वाले समय में इसे और बढ़ाया जा सकता है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है और कई देशों के बीच भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
साल 2018 में अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरानी तेल आयात पूरी तरह बंद करना पड़ा था। उस दौरान भुगतान व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली पर भी सख्त निगरानी थी। भारत ने तब वैकल्पिक तरीकों से भुगतान करने की कोशिश की थी, लेकिन वह ज्यादा समय तक सफल नहीं हो सका।
अब बदले हालात में भारत और ईरान के बीच लेन-देन के लिए नई और अधिक लचीली व्यवस्था अपनाई गई है। माना जा रहा है कि इस बार भुगतान स्थानीय मुद्रा या अन्य वैकल्पिक चैनलों के जरिए किया गया है, जिससे व्यापार को सुगम बनाने में मदद मिली है। इस बदलाव ने दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को फिर से सक्रिय करने का रास्ता साफ किया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से तेल आयात भारत के लिए कई मायनों में फायदेमंद हो सकता है। ईरान आमतौर पर प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध कराता है, जिससे भारत की कुल आयात लागत कम हो सकती है। इसके अलावा, ईरान भारत को बेहतर क्रेडिट शर्तें भी देता रहा है, जिससे भुगतान का दबाव कम होता है।
भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और देश अपनी खपत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। ईरान से आयात फिर शुरू करने से भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का अवसर मिलेगा और आपूर्ति में स्थिरता आएगी।
हालांकि, इस फैसले के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की नीतियों को ध्यान में रखते हुए भारत को संतुलन बनाए रखना होगा। किसी भी तरह का दबाव भविष्य में इस व्यापार को प्रभावित कर सकता है।









