पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा को तीन साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन दर्जनों परिवारों के लिए समय जैसे ठहर गया है। घाटी क्षेत्रों से लापता हुए 30 से अधिक लोगों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। इन परिवारों का कहना है कि वे आज भी अपने अपनों के लौटने की आस में हर दिन गुजार रहे हैं, लेकिन उन्हें न तो स्पष्ट जानकारी मिल रही है और न ही पर्याप्त सरकारी सहायता।
पीड़ित परिवारों ने हाल ही में एक बयान जारी कर अपनी पीड़ा साझा की। उनका कहना है कि पिछले तीन साल उनके जीवन के सबसे कठिन रहे हैं। “हर दिन उम्मीद के साथ शुरू होता है, लेकिन निराशा के साथ खत्म हो जाता है,” एक परिजन ने कहा। कई लोग हिंसा के शुरुआती दिनों में उस समय लापता हुए, जब वे जान बचाने के लिए भाग रहे थे या अपने घर लौटने की कोशिश कर रहे थे।
परिजनों का आरोप है कि उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, कई सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए और यहां तक कि मणिपुर हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। उनका कहना है कि जांच की रफ्तार बेहद धीमी है और कई मामलों में तो कोई प्रगति ही नहीं हुई।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी समस्या कानूनी प्रक्रिया को लेकर सामने आ रही है। नियमों के अनुसार, किसी भी लापता व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए सात साल का इंतजार करना होता है। जब तक यह अवधि पूरी नहीं होती, तब तक परिवारों को मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल सकता। इसके बिना वे सरकारी योजनाओं, मुआवजे और नौकरी जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
एक महिला, जिनके पति हिंसा के दौरान लापता हो गए थे, ने बताया कि उनका परिवार आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से संघर्ष कर रहा है। “हमें कहा जाता है कि पहले प्रमाण पत्र लाओ, तभी सहायता मिलेगी। लेकिन हमें तो यह भी नहीं पता कि हमारे अपने जिंदा हैं या नहीं,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार, यह स्थिति परिवारों को और अधिक परेशान कर रही है।
एक अन्य पीड़ित ने बताया कि उनके पति के लापता होने के बाद घर की जिम्मेदारी पूरी तरह उन पर आ गई है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की चिंता ने जीवन को बेहद कठिन बना दिया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन से कई बार गुहार लगाने के बावजूद कोई ठोस मदद नहीं मिली।
परिवारों ने सरकार से मांग की है कि लापता लोगों के मामलों की जांच के लिए एक विशेष टीम बनाई जाए और इस मुद्दे को प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक उन्हें कम से कम अंतरिम सहायता दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।
यह मुद्दा केवल लापता लोगों का नहीं, बल्कि उनके पीछे छूट गए परिवारों की जिंदगी का भी है। वे लोग जो हर दिन अनिश्चितता और दर्द के साथ जी रहे हैं, उन्हें अब न्याय और राहत की सख्त जरूरत है।
तीन साल बाद भी मणिपुर में कई परिवार अपने प्रियजनों की राह देख रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, उनका संघर्ष जारी रहेगा।







